Thursday, June 21, 2018

ढाई सदी..

मुझे पता है
तुम्हारी बालकॉनी से
समंदर दिखता है...
तुम हर खुशी के मौके पे
दौड़के आते हो वहां;
कभी कभी रोने भी...
कभी चाहनेवालों को हाथ हिलाने,
और कभी बस साँस लेने आ जाते हो
उस बालकॉनी पे, जहां से समंदर दिखता है।
तुम सोच रहे हो ये सब मुझे कैसे पता!
और अगर पता है तो उस वक़्त कहां थी मैं
जब तुम अकेले रो रहे होते थे!
सारे सवालों का जवाब ढूंढने तुम भी
मेरे पास आ सकते थे।
जिस समंदर से रोज़ बात करते हो,
एकबार बालकॉनी से उतर कर
उसकी लहरों को छू के पूछ सकते थे,
कहाँ हूँ मैं, क्यों हो तुम...अधूरे।

पिछले ढाई सदी से जहां खड़ी
मैं बह रही हूँ,
वहां से अब सिर्फ तुम्हारी बालकॉनी
दिखती है...
न तुम्हे तैरना आया न मुझे डूबोना...

Saturday, March 3, 2018

Paak paani

शुद्ध हो गई मैं, तेरी आँखों से पी के जहान।
तेरे अश्क़ से पाक पानी किसी गंगा में कहां...

Monday, February 5, 2018

छुपा लेती हूँ

आँखें दिख जाती है मगर मंज़र छुपा लेती हूँ।
ऐसे ही दुनिया से तुझे मैं अक्सर छुपा लेती हूँ।
तेरे इश्क़ में क़त्ल हुए कितने मेरी आँखों से,
गिरफ्तार होने से पहले खंजर छुपा लेती हूँ।
इश्क़ बनके जीना जैसे रूह बनके उड़ना है,
बादलों के भेस में अपना पैकर छुपा लेती हूँ।
वैसे तो मेरी मुस्कान यूँही हो गई है मशहूर।
बाक़ी सारे जज़्बात अपने अंदर छुपा लेती हूँ।
नूर-ए-जश्न में अंधी है सारी दुनिया बेवकूफ,
बड़े हुनर से आज कल ठोकर छुपा लेती हूँ।
'आईना' का ना माज़ी ना कोई मुस्तक़बिल है,
हाल मिट जाने के डर से पत्थर छुपा लेती हूँ।

ख्वाब ही थे

एक अरसे से बात नहीं कि हमने,
लेकिन आज दोपहर की नींद में,
तुम आये थे मुझसे मिलने।
सालों की दूरी एक पल में मिटाके
तुमने बड़ी आसानी से चुम लिया मुझे।
तुम्हारे होंठ जब मेरी पेशानी पे
बिछड़े दिनों की दास्ताँ लिख रहे थे,
मेरी आँखें बुझ गई थी।
अचानक आसमां ने
तुम्हारी आवाज़ में कहा
"इतनी बेरूखी क्या हुई
के बिछड़ते ही जा रहा हूँ,
रोते ही जा रहा हूँ..."
मैंने झटसे आँखें खोली और
सामने के आईने में देखा
तुम तब भी मेरे माथे को
चूम रहे थे और
आईने से देख रहे थे मुझे।
आँखें नम थी तुम्हारी।
हमारी आँखें आईने के ज़रिए
टकराते ही तुम ने नज़रें फेर ली
और दो बूंदें गिर गई
मेरी पलकों पे तुम्हारी आँखों से।
धीरे धीरे तुम्हे थामे मैं
तुमसे भी ज़्यादा रोने लगी।
रोते रोते सांस फूल गई और
हांपते हांपते नींद खुल गई।
ख्वाब था, ख्वाब ही थे।
ख्वाब का क्या भरोसा।
टूट ही जाता है आख़िर
रोज़ की नींद की तरह...

Monday, January 8, 2018

Zaroori nahin

तुझसे मिलते रहने के लिए मुलाक़ात ज़रूरी नहीं।
यूँही ख्वाबों में बहने के लिए हक़ीकत ज़रूरी नहीं...

हर मौसम गुज़रा है तेरे बगैर भी तेरे साथ ही।
राधा बनु या मीरा, इंतज़ार का अंत ज़रूरी नही...

Wednesday, January 3, 2018

दुआएं

तेरी पेशानी पे चिराग़ जले,
न बुझे आस कोई ख़ाक तले।
जब दुनिया में कोई लफ्ज़ न हो,
तेरे पन्नों पे कोई बात चले...

तेरी खुशियां भी तेरे साथ चले,
ना कोई ग़म हो तेरी पलकों तले।
जब दुनिया में कोई जश्न न हो,
तेरी उजली हँसी में रात ढले।

तेरी आँखों में गीली बात पले,
न दबे हौसले जज़्बात तले।
जब दुनिया में कहीं उर्दू न हो,
तेरे अल्फ़ाज़ में हयात चले।

तेरी सोहबत को न सबात खले,
लिखे जब यूँही तेरा हाथ चले।
जब दुनिया में कोई हुनर न हो,
तेरे जज़्बों में करामात पले।

Friday, December 29, 2017

नाम छुपाने पे मजबूर किया है

तेरे इश्क़ ने ही मशहूर किया है,
नाम छुपाने पे मजबूर किया है।
दिल की क्या औकात थी पहले,
मोहब्बत ने ही मग़रूर किया है।
कोई और लत क्या लगेगी मुझे,
तेरे प्यार ने ऐसा सुरूर दिया है।
टूटे भी मगर झुके नहीं 'आईना'
यक़ीन-ए-उन्स ने ग़ुरूर दिया है।

तेरे इश्क़ ने ही मशहूर किया है,
नाम छुपाने पे मजबूर किया है।
दिल की क्या औकात थी पहले,
मोहब्बत ने मग़रूर किया है।
साथ हो कर भी दिखता नहीं है,
ख़ुदा ने कुछ तो ज़रूर किया है।
टूटे मगर न झुके 'आईना'
तेरे अक्स पे ग़ुरूर किया है।

तेरे ही इश्क़ ने मशहूर किया,
नाम ढकने पे मजबूर किया।
है तो मामूली सा ये दिल मेरा
मोहब्बत ने ही मग़रूर किया।
साथ हो कर भी नहीं दिखता,
ख़ुदा ने कुछ तो ज़रूर किया।
टूट कर भी नहीं झुका 'आईना'
तेरे ही अक्स पे ग़ुरूर किया।

ढाई सदी..

मुझे पता है तुम्हारी बालकॉनी से समंदर दिखता है... तुम हर खुशी के मौके पे दौड़के आते हो वहां; कभी कभी रोने भी... कभी चाहनेवालों को हाथ ह...