आँखें दिख जाती है मगर मंज़र छुपा लेती हूँ।
ऐसे ही दुनिया से तुझे मैं अक्सर छुपा लेती हूँ।
तेरे इश्क़ में क़त्ल हुए कितने मेरी आँखों से,
गिरफ्तार होने से पहले खंजर छुपा लेती हूँ।
इश्क़ बनके जीना जैसे रूह बनके उड़ना है,
बादलों के भेस में अपना पैकर छुपा लेती हूँ।
वैसे तो मेरी मुस्कान यूँही हो गई है मशहूर।
बाक़ी सारे जज़्बात अपने अंदर छुपा लेती हूँ।
नूर-ए-जश्न में अंधी है सारी दुनिया बेवकूफ,
बड़े हुनर से आज कल ठोकर छुपा लेती हूँ।
'आईना' का ना माज़ी ना कोई मुस्तक़बिल है,
हाल मिट जाने के डर से पत्थर छुपा लेती हूँ।
Monday, February 5, 2018
छुपा लेती हूँ
ख्वाब ही थे
एक अरसे से बात नहीं कि हमने,
लेकिन आज दोपहर की नींद में,
तुम आये थे मुझसे मिलने।
सालों की दूरी एक पल में मिटाके
तुमने बड़ी आसानी से चुम लिया मुझे।
तुम्हारे होंठ जब मेरी पेशानी पे
बिछड़े दिनों की दास्ताँ लिख रहे थे,
मेरी आँखें बुझ गई थी।
अचानक आसमां ने
तुम्हारी आवाज़ में कहा
"इतनी बेरूखी क्या हुई
के बिछड़ते ही जा रहा हूँ,
रोते ही जा रहा हूँ..."
मैंने झटसे आँखें खोली और
सामने के आईने में देखा
तुम तब भी मेरे माथे को
चूम रहे थे और
आईने से देख रहे थे मुझे।
आँखें नम थी तुम्हारी।
हमारी आँखें आईने के ज़रिए
टकराते ही तुम ने नज़रें फेर ली
और दो बूंदें गिर गई
मेरी पलकों पे तुम्हारी आँखों से।
धीरे धीरे तुम्हे थामे मैं
तुमसे भी ज़्यादा रोने लगी।
रोते रोते सांस फूल गई और
हांपते हांपते नींद खुल गई।
ख्वाब था, ख्वाब ही थे।
ख्वाब का क्या भरोसा।
टूट ही जाता है आख़िर
रोज़ की नींद की तरह...
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